Sanskritik aur Samajik Anusandhan

Sanskritik aur Samajik Anusandhan


Sanskritik aur Samajik Anusandhan
Sanskritik aur Samajik Anusandhan
2021, Vol. 2, Issue 1
अष्टांग योग-एक विश्लेषण

अजित कुमार

मानव-व्यवहार का सीधा सम्बन्ध उसके मस्तिष्क से है, क्योंकि उसकी प्रत्येक क्रिया मन से प्रेरित होने पर ही सम्पन्न होती है। मनोविज्ञान के अनुसार भी यदि व्यक्ति के व्यवहार में परिवर्तन लाना चाहते हैं तो उसके चेतन तथा अवचेतन मन का अध्ययन कर विभिन्न मनोवैज्ञानिक उपायों द्वारा यह संभव हो सकता है। योग-दर्शन में इस मन अथवा मस्तिष्क को चित्त पद से अभिहित किया गया है, यही सांख्य का महत् है। इसकी उत्पत्ति प्रकृति से सर्वप्रथम हुई है। यह यहाँ व्यापक अर्थ में प्रयुक्त होता है जिसके अन्तर्गत आत्मचैतन्य, मन एवं बुद्धि भी समाहित है। विज्ञानभिक्षु अन्तःकरण सामान्य को चित्त मानते हैं। व्यास देव ने चित्त की उपमा दो धाराओं वाली नदी से दी है जिसकी एक धारा कल्याण के लिए, दूसरी पाप के लिए बहती है। यद्यपि चित्त भोग एवं मोक्ष दोनों ओर ही गति करने की सामथ्र्य रखता है तथापि वह अनादिकाल से चले आ रहे स्वभाववश, पापवाहिनी धारा की ओर ही प्रवाहित होकर निरन्तर विषय वासनाओं में फंसा रहता है। मनुष्य की विषयासक्ति का कारण बताते हुए कठोपनिषद् में तो यह कहा गया है कि स्वयंभू ने इन्द्रियों को रचा ही बाह्य विषयोन्मुख है तब वे अन्तर्मुखी न हों तो क्या आश्चर्य? प्रसिद्ध दार्शनिक राधाकृष्णन् भी विषयासक्ति को आत्म-साक्षात्कार में बाधक मानते हुए लिखते हैं यद्यपि हममें से प्रत्येक के अन्दर आत्मा का बीज उपस्थित है, पर हमारा चैतन्य इसे ग्रहण नहीं कर सकता, क्योंकि यह अन्य वस्तुओं में अत्यन्त व्यग्रता के साथ रमा रहता है।
अतएव मुमुक्षु के लिए आवश्यक है कि वह विषय वासनाओं में न फंस कर अपने चित्त को विपरीत दिशा में गतिशील बनाये, इसके लिए उसे कठोर परिश्रम करना होगा। विभिन्न दार्शनिकों ने मोक्ष प्राप्ति के भिन्न-भिन्न साधनों का वर्णन किया है। योग-दर्शन में पतंजलि ने साधक भेद से साधनों में भी भेद किया है। इसका स्पष्ट उल्लेख यद्यपि स्वयं पतंजलि ने नहीं किया तथापि प्रसंगानुकूल अर्थ व्याख्याकारों ने लगाए हैं। उन्होंने जिन साधनों का उल्लेख किया है, वे हैं-अभ्यास-वैराग्य, क्रियायोग एवं अष्टांगयोग। 
व्यास, भोजदेव एवं वाचस्पति मिश्र आदि व्याख्याकारों ने साधकों की दो श्रेणियाँ मानी हैं- एक वे साधक होते हैं जिनका चित्त पूर्वजन्म के प्रताप से समाहित अवस्था में होता है, जो योगरूढ़ कहे जाते हैं, दूसरे साधक वे हैं जिनका चित्त व्युत्थित (चंचल) है और विषय वासनाओं में ही फंसा हुआ है, परन्तु फिर भी वे योग-मार्ग पर अग्रसर होने के इच्छुक हैं, इन्हें आरुरुक्षु की संज्ञा दी जाती है। इनमें से जो पहले प्रकार के साधक हैं उनके लिए ही अभ्यास एवं वैराग्य रूप साधनों का उपदेश दिया गया है और अन्य साधन क्रियायोग तथा अष्टांगयोग व्युत्थित चित्त वाले साधकों के लिए है, क्योंकि वे अभ्यास एवं वैराग्य को सिद्ध करने में सक्षम नहीं होते।

Download  |  Pages : 07-12
How to cite this article:
अजित कुमार. अष्टांग योग-एक विश्लेषण. Sanskritik aur Samajik Anusandhan, Volume 2, Issue 1, 2021, Pages 07-12
Sanskritik aur Samajik Anusandhan Sanskritik aur Samajik Anusandhan