वर्ग उन्मूलन संबंधी संकल्पना और डॉ. लोहिया के विचार
अखिलेश त्रिपाठी
वर्गों में समाज का विभाजन और विभिन्न वर्गों के बीच चलने वाला सतत संघर्ष ऐसे स्तर पर चला गया था कि प्रत्येक उत्पादक अपने उपभोग के लिए आवश्यक परिणाम से अधिक उत्पादन तो कर सकता है, लेकिन समाज द्वारा उत्पादित कुल सम्पत्ति समाज के प्रत्येक सदस्य के लिए सुखी जीवन की दृष्टि से अपर्याप्त रहती है, ऐसी स्थिति में यह तार्किक है कि शोषकों का छोटा सा अल्पसंख्य वर्ग शोषितों के बहुसंख्यक वर्ग द्वारा उत्पादित अतिरिक्त पूंजी को ग्रहण कर ले। अतिरिक्त पूंजी अर्थात् ऐसी सम्पत्ति जो उत्पादकों की अपनी आवश्यक आवश्यकता को पूरा करने के बाद शेष रह जाती है, यही वर्ग संघर्ष का आधार बनती है। लेकिन वर्ग विभाजित समाज को वर्ग विहीन समाज में परिवर्ति करना आसान कार्य नहीं होता। डॉ0 लोहिया समाजवाद के स्थापनार्थ वर्ग समाप्ति की अपरिहार्यता स्पष्ट की और वर्ग विहीनता के लिए विभिन्न प्रयत्नों को क्रियात्मक रूप प्रदान किया। डा0 लोहिया गांधी जी की कल्पना का समाजवाद लाना चाहते थे। डा0 लोहिया गांधी जी की अहिन्सा पर आधारित संघर्ष का प्रयोग दलितों एवं समाज के उपेक्षित लोगों के हाथ में सत्ता देने के पक्ष में थे। पंडित नेहरू ने जहा इसे सतही रूप में देखने का प्रयास किया वहा डा0 लोहिया भारतीय भूमि पर उसकी सामाजिक वास्तविकता के अनुरूप उसकी व्याख्या प्रस्तुत की। यह भारतीय समाज को समझने और व्याख्यायित करने की डा0 लोहिया की विलक्षण प्रतिभा की परिचायक है।